
कविता
कविता मात्र कागज पर कलम से लिखी गई कुछ पंक्तियाँ नही हैं। उसका हर शब्द केवल वर्णमाला का योग नहीं है, जो आपस में जोड़

कविता मात्र कागज पर कलम से लिखी गई कुछ पंक्तियाँ नही हैं। उसका हर शब्द केवल वर्णमाला का योग नहीं है, जो आपस में जोड़

नया साल फिर आ रहा है, मन को मेरे जला रहा है । दिसंबर फिर से जा रहा है, नया साल फिर आ रहा है
सबसे शीतल सबसे पावन, गंगा मां है धार तुम्हारी, तेरे चरणों का मैं सेवक, तुम जग की तरण हारी, कोई भागीरथी कहता है, कोई सुर

पीली पीली सरसो फुलाके यहां चारों ओरपूरे इस जहां के हर दिल में ही छाई हैइसी के बगल में ही मटर भी फुलाई हुईछोटे श्वेत

तुम अपने आप को पहचानो,सही गलत में अन्तर जानो ।तुम नहीं किसी से निम्न हो,खुद को न कभी दुर्बल मानो ।। मन में यदि संकल्प

एक आवाजपुकार बन उभरीतो हजारों कदमकारवां बन जुड़ गएआग्रह शांत और विनीत थातो क़दमों का शोरसुरीली लय बन गयानारों में सच की आत्मा थी तोघनघोर

सुबह के पन्नों पर पायीशाम की ही दास्ताँएक पल की उम्र लेकरजब मिला था कारवाँवक्त तो फिर चल दियाएक नई बहार कोबीता मौसम ढल गयाऔर

शब्द से चेतना तक फैले हुए हैंहर तरफ नयन ही नयननयनो की अपनी लिपिअपनी भाषा अपनी विधाअपनी सूक्तियांअपने दोहे अपनी चौपाइयांनयनो के अपने सरोवरअपने सागर

परेशान आदमीशायद जानता ही नहींजहाँ राह खत्म होती हैवहीं शुरू होती हैनई मार्ग रेखाएंबस दो कदम और चलतातो तसव्वर से ज्यादा मिलने वाला थाअसबाब हो

मनुष्य अभीप्साओं का पिंड ही तो हैजीवनभर चला करता हैतमन्नाओं का सिलसिला ।एक के पास दूसरी इच्छा।अंतहीन सफर।तुष्टि अनवरत खोज ।एक बसेरा निकेत बन जाएतो