सुना था, आज भी लोगों में कुछ तो इंसानियत बाकी है,
पर यहां हर चेहरा, अब छलावा, फरेबी, धोखेबाज सा लगता है।
यकीन पर यक़ीनन, अब यकीन करना संभव नहीं
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।।
हर जगह झूठ का तांडव है, हर जगह लोग खोटे क्यों मिलते!
अफ़सोश करें, या इन सबसे दूर रहें,
कोई भी उपाय, अब सुकून की वजह नहीं।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।।
चापडूसों का बोल बाला है,
झूठें लोगों के बीच सच्चाई दम तोड़ रही,
हम कैसे छोड़ दे अपनी सच्चाई, हमने ये सिखा नहीं।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।।
दम घूट रहा देख ऐसे ढोंगी लोगों को,
जिनमें न शर्म न लिहाज अब बाकी है,
कैसे खुद को महफूज रखें,
ऐसे दानव रूपी सफेदपोशों से।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।।
©®पूनम गूंजा
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