
अब बहारें भी
अब बहारें भी मेरे घर में,आती नही है, अब हवाएं भी तेरा,संदेशा लाती नही है ।। किस ओर चले गए,तुम छोड़कर मुझको, ये सदायें भी

अब बहारें भी मेरे घर में,आती नही है, अब हवाएं भी तेरा,संदेशा लाती नही है ।। किस ओर चले गए,तुम छोड़कर मुझको, ये सदायें भी

धन्य धन्य गुरु गोविंद सिंह, है धन्य तुम्हारे लाल । धन्य तुम्हारे त्याग है, है धन्य धन्य बलिदान ।। ऋणी रहेगा युगों युगों तक, ये

कब तक पिंजड़े में तड़पते रहेंगे, कब इन पंखों को हम फैलाएंगे । हम स्वतंत्र नभ पर विचरण करने वाले, अब इस पिंजरे में न

विनाश हुआ कौरव वंश का, पांडवों ने विजय थी पाई युधिष्ठिर का राजतिलक करके, द्वारिका को लौट गए कन्हाई, जाने क्यूं धर्मराज का, ह्रदय बहुत

अंग्रेजी वाले साल की, अंग्रेजी में ही बधाई हो । बहार मिले हर कदम पे, कोई न उदासी छाई हो, पुष्पों की बगिया महके, सुगंध

विगत वर्षों में खोए हमने , अपने बहुत से मित्र । रह गए उनसे रिश्ते फीके , जो थे हृदय में बैठे नीके । छुपाए

जबसे हुए हैं शिक्षित, ताजा विचार आयापरिपाटिया भी हमको, दिखने लगी छलावामाया का जाल ऐसा, कोई नहीं किसी काहर आदमी अकेला, हर चेहरा अजनबी साबाहर

आया है नव वर्ष, लोगों में लेकर नई उम्मीद नया जुनून और नई आशा ।। आया है नव वर्ष , दूर करने अकर्मण्यता दिलाने सफलता

करले तू इस जगत में सद्व्यवहार एक दिन। जाना पड़ेगा छोड़कर संसार एक दिन।। विषयादि त्रिगुण फंद अविद्या विकार में, स्व ढका मन बुद्धि चित्त

पौरुषता हरियाली का नाम ही किसानी थी l आज मैं बूढ़ा बैल हूँ कभी जवानी थी ll निर्धनता घर में थी श्रम से उसे उबार