जबसे हुए हैं शिक्षित, ताजा विचार आया
परिपाटिया भी हमको, दिखने लगी छलावा
माया का जाल ऐसा, कोई नहीं किसी का
हर आदमी अकेला, हर चेहरा अजनबी सा
बाहर ही दिखती खुशियां, अंदर खुशी नहीं है
रिश्तों में घुलती मिश्री, दिखती कहीं नहीं है
सब अपने में ही सिमटे, पड़ोस ना किसी का
कैसा है यह जमाना, रिश्ता भी स्वार्थ ही का
रिश्तों की अब यह खुशबू ,तो स्वार्थ से भरी है
मानवता अपनी मानव ने, खुद ही अब छली है
धैर्य सब्र ना ही, अब सहनशीलता है
सबके दिलों में अब तो, बस जोश ही भरा है
डूबे हैं आंसुओं में, हर ओर है उदासी
दहशत भरी है सब में, कोई नहीं है बाकी
गाड़ी है घर है बंगला, कोई कमी नहीं है
सब कुछ भरा पड़ा पर, दिल में सुकू नहीं है
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


