
सियासत
आईना सच कह गया जब राज दरबारो मे टुकडो टुकडो मे बट गया आज बाजारो मे राम के अस्तित्व को ही नकारने लगे है लोग

आईना सच कह गया जब राज दरबारो मे टुकडो टुकडो मे बट गया आज बाजारो मे राम के अस्तित्व को ही नकारने लगे है लोग

यह प्रेम अगर फिर अपना होता मैंने भाग्य सँवारा होता तुम मिलते फिर फिर से मुझको क्यो प्यार मेरा बञ्जारा होता कुछ भी मेरे पास

मेरे चेहरे पर कई जिम्मेदारियों की हैं झुर्रियां ,तुम कहते हो, कि मैं अब उम्र दराज हो गया llतुम देखो कभी सवेरे मेरे डूबते सूरज

आँखों का होता इशारा गर कभी मेरी तरफचांद तारों का बदलता रूख सदा मेरी तरफलड़खड़ा गिरता कभी ना जिंदगी के मोड़ परतेरी बाहों का सहारा

जब गली में मेरे आज आ ही गए दिल से दिल आके अबतो मिला लीजिए फूल ना मिल सका कोई गम ना करो हार बाहों

वाह रे मेरे समाज चरित्र का परिचय हर बार “स्त्री” ही क्यों देती है? जबकि चरित्र को खराब करने का काम “पुरुष” ही करता है..!

आज भी वही मुलाकाते,बातें,वादे,इरादे वही आंतरिक अनुभूति की सिहरन सी मुझे स्वयं के भीतर कराती अहसास कि काश न किया होता स्वयं से समझौता आज

ऐ जिंदगी..! मैं दिशाहीन नहीं हूँ बस तुझे समझने को प्रयासरत हूँ कभी परिभाषित तो कभी शून्य पाती हूँ कभी खुद को खुद में समेट

वक़्त कट जायेगा कठिन भी सुनता आया था लोगों से मैं पर साथ मेरे क्या बेबसी है वक़्त मुझको ही काटता है वक़्त मुझको ही

नव वर्ष का नवल प्रभात अति सुखद सुवास हो। निर्झरिणी बहे स्नेह की जन जन में प्रेम प्यास हो।। प्रिय से मिलन की चाह हो,