कविता

Category: कविता

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खोया पाया

पुँछकर देखा खुद से क्या खोया क्या पाया हमने चंद चाँदी के सिक्के पाये है पर मुस्कान खोया हमने बेचकर शकुन दिल की शहर से

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सियासत

आईना सच कह गया जब राज दरबारो मे टुकडो टुकडो मे बट गया आज बाजारो मे राम के अस्तित्व को ही नकारने लगे है लोग

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इक सुर काश तुम्हारा होता

यह प्रेम अगर फिर अपना होता मैंने भाग्य सँवारा होता तुम मिलते फिर फिर से मुझको क्यो प्यार मेरा बञ्जारा होता कुछ भी मेरे पास

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मेरे चेहरे पर कई जिम्मेदारियों की हैं झुर्रियां

मेरे चेहरे पर कई जिम्मेदारियों की हैं झुर्रियां ,तुम कहते हो, कि मैं अब उम्र दराज हो गया llतुम देखो कभी सवेरे मेरे डूबते सूरज

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हो अगर मेरी तरफ

आँखों का होता इशारा गर कभी मेरी तरफचांद तारों का बदलता रूख सदा मेरी तरफलड़खड़ा गिरता कभी ना जिंदगी के मोड़ परतेरी बाहों का सहारा

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निरूत्तर सी मैं

वाह रे मेरे समाज चरित्र का परिचय हर बार “स्त्री” ही क्यों देती है? जबकि चरित्र को खराब करने का काम “पुरुष” ही करता है..!

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अनुभूति

आज भी वही मुलाकाते,बातें,वादे,इरादे वही आंतरिक अनुभूति की सिहरन सी मुझे स्वयं के भीतर कराती अहसास कि काश न किया होता स्वयं से समझौता आज

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