फ़कत बीज नहीं
बटोही जैसे जुगाता है गठरी चिड़िया अंडा जुगाती है जुगाये हमने बीज बोया-लगाया खेतों में कि लहलहायेगी फसल बालियाँ खनकेंगी खिलखिला उठेगा खलिहान फ़कत बीज
बटोही जैसे जुगाता है गठरी चिड़िया अंडा जुगाती है जुगाये हमने बीज बोया-लगाया खेतों में कि लहलहायेगी फसल बालियाँ खनकेंगी खिलखिला उठेगा खलिहान फ़कत बीज
बुद्धि के दुर्गम किले में/ कैद भोली भावना है/ कंटकों की कचहरी में /फूल फरियादी बना है ! ज़िन्दगी का अर्थ — केवल अर्थ-संचय, त्याग
अनमना दिन/हाँफती हवा न चमक , न चहक फैली हुई दूर तक चुप्पी की चादर ! कोई पंजा- अदृश्य,अरुण रेंगता है लताओं , शाखों पर
सेमल के फूल लाल -लाल , कितने लाल ! रंग दिये फागुन ने मौसम के गाल ! झर गया पुरानापन पीत पत्र संग रंग-रूप नया-नया,नयी
तुम्हारे साथ आता है एक मौसम मेरे पास रूप-रंग-सुवास का तृप्ति ,विश्वास का जीवन के गहरे स्वीकार का मौसम ! मौसम अछोर संवादों का मोरपंखी
किनारे ही बैठ केवल कुलबुलाना है कि साथी पार जाना है ? है हवा प्रतिकूल,विस्तृत पाट,धारा भँवर वाली बधिर बाधाएँ- करें हम प्रार्थना या बकें
तुम्हारी याद जैसे घने जंगल में भटके हुए पिपासाकुल बटोही के कानों में बज उठे किसी निर्झर की आहट का जलतरंग ! तुम्हारी याद जैसे
मैं कहीं पर रूक न पाया! एक हृदय ले इस जगत में, पथ पे अपना पग बढ़ाया। राह में छाया सघन थी, पंछी ने आवाज
चित्र संजोए बचपन के, यौवन का कुछ उद्गार लिए, घुम रहा डगर शहर में- यादों का एक संसार लिए। बिजली -बत्ती रह-रह कर, बीच सड़क
शोणित था माँ का दूध नहीं था तुम्हें गर्भ में जो थी पिलाती लाने को दुनिया में तुमको सहा था माँ ने दर्द अपरिमित आये