कविता

Category: कविता

।। अभिनय।।

पात्रता तो मुझमें कहाँ है फिर भी अभिनय कर रहें हैं सोंच में तेरे मर रहे हैं।। देखने को उर में मेरे, उठ रही अभिलाष

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।। मनुज।।

प्रतिबिंब पर मत टिकें बिंब कुछ तो और है मनुज जग का सिरमौर है।। सिंधु के उद्दाम लहरों को, नाप डाला है मनुज हवाओं पे

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।। रिश्ते।।

दामिनी दमकी गगन में फिर निराशा छा गयी वो पास कैसे आ गयी।। टिकते नहीं रिश्ते पुराने, जग में ऐसा वाद है जनक सुत संग

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।। पानी – पानी।।

चहुंओर दिख रहा पानी – पानी कीचड़ से गीली चूनर धानी। बच्चे कागज की नौका दौड़ाये हाल नदी की वही पुरानी।। खतरों से वह खेल

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देश के रहनुमाओं से मेरे इन सवालों के ज़बाब चाहिए

ये नफऱत,ये दहशत ये दिलों की दूरीकब मिटेगी ?? ये शिक़वे, शिक़ायत व बदले की आगकब बुझेगी ?? ये लालच,चोरी व दौलत की भूखकब मरेगी

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उंगलियाँ

लम्बी, छोटी नाजुक उंगलियाँ समवेत गोलबन्द होती हैं हथेली पर जब -मुट्ठी बन जाती है उनकी नजाकत अचानक हो जाती है मुट्ठी की ताकत हथेली

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शब्द

काॅफीघरों-चायखानों बैठकों , भाषण-मंचों के वृत्त से उछाले,पटके जाते हुए सरकाये , चबाये जाते हुए रात-दिन नीमजान हो गये हैं शब्द पीत,पस्त, खिन्न! शिद्दत से

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