
पाप की गठरी
पाप की गठरी भारी है भैय्या पाप की गठरी भारी है भैय्या। सुन मोरी बहिनी, सुन मोरी मैया पाप की गठरी भारी है भैय्या… छल

पाप की गठरी भारी है भैय्या पाप की गठरी भारी है भैय्या। सुन मोरी बहिनी, सुन मोरी मैया पाप की गठरी भारी है भैय्या… छल

अंधेरा बहुत था, मगर आगे बढ़ने चला था। पढ़ना मना था, फिर भी पढ़ने चला था।। बहुतों ने चाहा हराना उसे, अकेले ही दुनिया हराने

सबरी राह देख रही है, रघुवीर मेरे कब आयेंगे । नैन मेरे अति व्याकुल है, कब इनकी सुधा मिटाएंगे ।। पथ से कंटक नित्य हटाती

मौसम के भी गजब नजारे, लगते कितने मन को प्यारे । कभी शरद तो कभी बसंत, पतझड़ के अंदाज निराले ।। जब ग्रीष्म ऋतु से

अगर मुझ पर कभी तेरा इशारा हो गया होता डूबती धार में मुझको किनारा मिल गया होता कभी भी लड़खड़ा करके न गिरता फिर तो

आसमा जब अहम का झुक जाएगा मैं ही सब कुछ हूं जेहन पनप जाएगा तब अहम का नशा दिल में छा जाएगा देगा कुछ भी

फिर से मानवता घबराई है, फिर से एक आहट आई है । करोना अबकी मत आना, तुमको ये राम दुहाई है । इस मुश्किल से
ये इश्क का जुनून, नफरत में बदलता जा रहा है । पहले पैंतीस टुकड़े थे, अब कोई पचास बता रहा है ।। अब इंसान में

मजहब के रंग में रंगा हुआ जो पूरा देश है आजतो कैसे सुधरेगे हालातलूट के अपने देश की दौलत खुद बनते धनवानतो कैसे सुधरेंगे हालातसब्र

है प्रकृति का संवरना तो सबके लिएलाभदायक है पूरे जगत के लिएआओ सिंगार मिलकर प्रकृति का करेंबिखरी आभा प्रकृति की तो सबके लिएचांदनी रात शीतल