कविता

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मैं

एक “मैं” दूसरे “मैं” के साथ , बैठ बात कर रहे थे l “मैं” बोल रहा था बिना जुबां चलाये , और मैं सुन रहा

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तुम वक्त सी निरंतर मुझमें चलती हो

तुम वक्त सी निरंतर मुझमें चलती हो, मैं मौसम बन बदलता रहता हूँ ll कभी खुद के अन्दर का अंधेरा लिए, उजालों में भटकता रहता

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श्रृंगार

कनक कटोरी कर्ण कर्णफूल किंकिणि सुनि, कोटि-कोटि काम कूदि कूदि चलि आवत है। खन-खन-खनकार खंजनिका के कंगन करें, सृष्टि में संगीत की सुर सरिता बहावत

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सती सुलोचना

शेष सुता लंकेश बहू घननाद प्रिया लंका युवरानी। सती सुलोचनि चारों युग में अमर रहेगी तेरी कहानी।। साज कर चतुरंगिनी इन्द्रदमन जब चलने लगा, मान

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26/11 की घटना पर एक सोच

तूफानों का जोर लगाकर समय नया लिख जाएंगे आज हिमालय के माथे पर सूरज नया उगायेंगे गरजेगा यह सिंधु उफनकर राह नई दिखलाएगा मातृभूमि के

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आगोश

छिपा छिपा सा राज प्रकृति का जो देता संदेश सूर्यास्त बता रहा है मुझे कि वो चला शाम ढलते ही अंधेरे के आगोश में मिलता

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एकाकार

मन शांत लिए ही स्थिर सी आज बैठ गई थी मानों एकाग्रता में सोच पाऊँगी अपने को व अपने भविष्य को झांक पाऊँगी स्वयं में,

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