
सन् 1857 महाक्रांति के योद्धा, हरियाणा के राजनायक राजा राव तुलाराम
धरा धरणि हिल गए निशाने गगन की ओट लगाए थे स्वतंत्रता के शूरवीर उस महायुद्ध में आए थे रखकर जान हथेली पर दुश्मन पर भृकुटि

धरा धरणि हिल गए निशाने गगन की ओट लगाए थे स्वतंत्रता के शूरवीर उस महायुद्ध में आए थे रखकर जान हथेली पर दुश्मन पर भृकुटि

सबके मन मा एक ठाउर अंग्रेजिक बस हव्वा हय।सब भाषा हय बगुला जस अंग्रेजी एक कौव्वा हय।।अंग्रेजी जानय वाले मनाई नेपालिन से हय भेद करत।अंग्रेजी

मां शारदे हे मां शारदे ! तनिक सा तो तार दे, अज्ञानता से भरी है दुनिया तनिक सा संवार दे..!! सब समझते ज्ञानी स्वयं को

आज लेकर एक कोरा कागज़ लिख देना चाहती हूँ अपनी व्यथा या कहूँ कि मन के भीतर कुछ घुमड़ते हुए मनोभाव लगता हैं भर दूँगी

हम मजदूर हैं साहब श्रम से न कभी घबराते है । खून पसीना दोनो मिल जाते, तब अपने घर चल पाते है ।। सर्दी, गर्मी

शत्रु को मार के सीमा पर,खुद के भी होश खोया होगा । वतन की मिट्टी चूम के सैनिक,मृत्यु की गोद में सोया होगा ।। मां

नमन करते मेवाड़ भूमि को, जिसने न शीश झुकाया था । जिनकी तलवारों के शोर से, ये धरती_अम्बर थर्राया था ।। वो धरती पुत्र महाराणा

मां की गोद है सबसे प्यारी, इसकी तो है बात निराली । इसका अंचल कवज के जैसे, दुआ से मिटती विपदा सारी ।। माता यशोदा

खून के बदले आजादी की, कीमत सबने चुकाई थी । हंसते हुए सूली पे चढ़े, सीने पर गोली खाई थी ।। जलियांवाले बाग में, रक्त

हम से बयां हो न सकी,ये मासूम सी मुहब्बत, तुम अगर समझ लेते, तो यार बहुत अच्छा था । अभिनय में ही निकल गई,अब यार