
हम हन दलित नारी
तुम सब जने अछूत कहत, हम हन दलित नारी।गरीबी विभेद अन्याय, भूंख प्यास से हम मारी।।तुमरे घर कोई जानवर मरे तो दलित मर्द उठाईस हय

तुम सब जने अछूत कहत, हम हन दलित नारी।गरीबी विभेद अन्याय, भूंख प्यास से हम मारी।।तुमरे घर कोई जानवर मरे तो दलित मर्द उठाईस हय

मैं रखता हूँ इच्छाओं का अनंताकाश, नहीं माँगता मैं अवकाश। मन करता है कभी इस डाल पर इस डाल से कभी उस डाल पर डालूँ

हे धरणे! मैं तुमसे प्यार करता हूँ इतना। वह शब्दातीत है, वर्णनातीत है हमेशा से मेरी उठने वाली तरंगे लगती हैं जैसे प्रफुल्लित उमंगे उन्होंने

सेवा पुस्तिका में लिख दी गई एक ही दिन सेवा नियुक्ति के साथ लिखी सेवा निवृति दोनों ही शब्दों में ’नि’ लगा है उपसर्ग लेकिन

व्याकुल अखियाँ तरस रही हैं दीदार तुम्हारा पाने को झर- झर होकर बरस रहीं हैं दरश तुम्हारा पाने को तैयारी मिलकर करो अब श्याम संग

फूल की बगिया में देखों आज ये क्या हो गया है। लूटकर मेरे चमन को काल जैसे सो गया है। भाइयों के वियोग में हूँ

मेरे पाँव की पायल भारी होती चली गयी। मैं मंदिर से महफिल होती होती चली गयी॥ जाने कितने ब्याह रचाए, फिर भी रही अकेली, जिसने

कली खिलना चाहती है, फूल बनना चाहती है। कर दो पूर्ण स्वतंत्र उसको, अब वो बढना चाहती है। समाज रहा है उस पर अवसित, जाने

प्रेम भक्त की आराधना है, साधक की साधना है। प्रेम मिलन की आस है, उन पर विश्वास है। प्रेम जीवन का आधार है, नाव की

कुछ इस कदर छाया है आँचल आपका मुझपर जिधर देखता हूँ आलम्ब आपका पाता हूँ। राहें जिन्दगानी में तुफानों से भरी जवानी में, जब कभी