कविता

Category: कविता

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नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता:प्रणता:स्म ताम् ॥” हे माँ! तुम्हारे दर पे आए ज्ञान का वरदान दो।। कर दो सारे

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अपनेन बूते मंगलसूत(अवधी कविता)

आगे बढिगा ढेरि जबाना अंगुरी आजी बाबक् छूट अम्मा बप्पक कहेम चलत हैं कहां बताओ बिटिया पूत अंगरेजी कै यहै पढाई परमपरा का लइगै लूट

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हम अपनी दौलत लूटा रहे है

कवन, बिधि करू, मुकुन्द हम, तोड़ बड़ाई,कबहुं, प्रेम, कभी करू, लड़ाई,तोड़ प्रीति, सुनु हरजाई,मोरे मन ही मन मे, हेराई।। अब, करहु सनाथ, राम रघुराई।हे, अ

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मेरी जान को, मेरी जान से दिक्कत है

हम ने दमन, बचाने, की बड़ी, कोशिशें की मुकुन्द,पर, उन्होंने दामन, न छोड़ा, कभी चलते चलते,वो जो, शामिल रहे, मेरे मरने, की ज़िद में,मुकुन्द, ख़ुदा

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