पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

गज़ल

मान लेंगे वो बुरा तो मुस्कराना छोड़ दें

मान लेंगे वो बुरा तो मुस्कराना छोड़ दें किस सबब उनकी जलन में गीत गाना छोड़ दें अपना तो हर धर्म ईमां हर चलन है

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गज़ल

छिप छिप के तीर

छिप छिप के तीर दिल पे चलाते हो किसलिए यूँ दुश्मनी मेरे से निभाते हो किसलिए जाना ही है तो पास ही आते हो किसलिए

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पद्य-रचनाएँ

तसब्बुर में तेरे रहा उम्र भर

तसब्बुर में तेरे रहा उम्र भर न पूछो कि क्या क्या सहा उम्र भर हरिक मोड़ पर इस जहां ने मुझे है पागल दीवाना कहा

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गंगा माँ

सबसे शीतल सबसे पावन, गंगा मां है धार तुम्हारी, तेरे चरणों का मैं सेवक, तुम जग की तरण हारी, कोई भागीरथी कहता है, कोई सुर

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गीत

वीर मल्हार

कट कर शीश गिरे धरा पर, लेकिन रूंड करै तलवार । मृत्यु से भी जो लड़ बैठे, ऐसा दिवला का राजकुमार ।। बावन गढ़ के

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कविता

प्रकृति चित्रण

पीली पीली सरसो फुलाके यहां चारों ओरपूरे इस जहां के हर दिल में ही छाई हैइसी के बगल में ही मटर भी फुलाई हुईछोटे श्वेत

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पद्य-रचनाएँ

मीत

बस गए जो दिल में आके दिल के वही मीत थेदिल से जो निकल गए वो ढोंग के प्रतीक थेस्वार्थ भाव जब उगा भावना के

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