कुसुम खिलाना है
गीतों में भर-भर कर /जीवन-राग सुनाना है जो सोया मुँह फेर समय से /उसे जगाना है। सत्पथ पर ही चलकर हमको/मंज़िल तक जाना है बेशक
गीतों में भर-भर कर /जीवन-राग सुनाना है जो सोया मुँह फेर समय से /उसे जगाना है। सत्पथ पर ही चलकर हमको/मंज़िल तक जाना है बेशक
बाहर कम अधिक- अधिक भीतर कायम है डर तिरती बर्फ जैसे जल पर घने अँधेरे में दीख जाती है औचक सामने कोई रस्सी सिहर जाता
तीरगी-तीरगी बढ़ रहे ये क़दम चार पल की मधुर चाँदनी के लिए । दरमियाँ दो दिलों के बहुत फासला छू रही है शिखर छल-कपट की
नयनाभिराम/बहुवर्णी विविधगंधी/मनोहारी फूल मुरझा जाते हैं एक दिन धूमिल पड़ जाता है रंग सूख जाता है मकरन्द झड़ जाती हैं पंखुरियाँ ! फिर भी ,
किसको फ़ुर्सत पढ़े-सुनेगा ? फिर भी लिखना है,गाना है ! ख़ुदगर्जी की होड़ मची है मतलब के सब नाते हैं मन में कपट और कटुताएँ
अँधेरे से आलोक की इस यात्रा में पार करना है एकाकी नदी,वन,पर्वत किसी राजर्षि की सनक पर सवार हो नहीं लेना मुझे स्वर्ग याद है
बिक गये जो वस्तुओं की भाँति होकर चरण-चाकर रह गये जन के मन में,यश-गगन में आज हैं,कल भी रहेंगे आँधियों का वेग अपने वक्ष पर
माँगना न गीत अब गुलाब के ज़िंदगी की हर तरफ बबूल ! सुबह-शाम पेट का सवाल है बतिआयें प्यार, यार!किस तरह? पतझरी उदासी है रू-ब-रू
देखा है उन्हें उदास मैंनेहताश नहींथकते देखा हैटूटते नहीं बाढ़ बहा ले जाती हैख़ून-पसीने से उगायी फसलझुलसा देता है सूखाहरिआयी रबी जबदेखा है उन्हें गंभीर,ग़मगीन
क्रान्ति-वेला की ललित ललकार है तुलसी शारदा की बीन की झंकार है तुलसी । शील में देवापगा की लहर की मानिन्द शक्ति में गर्जित जलधि