।। अभिनय।।
पात्रता तो मुझमें कहाँ है फिर भी अभिनय कर रहें हैं सोंच में तेरे मर रहे हैं।। देखने को उर में मेरे, उठ रही अभिलाष
पात्रता तो मुझमें कहाँ है फिर भी अभिनय कर रहें हैं सोंच में तेरे मर रहे हैं।। देखने को उर में मेरे, उठ रही अभिलाष
प्रतिबिंब पर मत टिकें बिंब कुछ तो और है मनुज जग का सिरमौर है।। सिंधु के उद्दाम लहरों को, नाप डाला है मनुज हवाओं पे
दामिनी दमकी गगन में फिर निराशा छा गयी वो पास कैसे आ गयी।। टिकते नहीं रिश्ते पुराने, जग में ऐसा वाद है जनक सुत संग
चहुंओर दिख रहा पानी – पानी कीचड़ से गीली चूनर धानी। बच्चे कागज की नौका दौड़ाये हाल नदी की वही पुरानी।। खतरों से वह खेल
कड़कड़ाती ठंड में,जल से फसल सींचते है, जब कार्य पूर्ण न हो,आराम नही वो करते है । मेरा शत शत प्रणाम, है अन्नदाता को, जो
आंखों में तुझको देखा है मैंने आंखों में तेरे एक ख्वाब देखा है हुस्न ए रूप में भी आफताब देखा है जिंदगी में अगर होते
ये नफऱत,ये दहशत ये दिलों की दूरीकब मिटेगी ?? ये शिक़वे, शिक़ायत व बदले की आगकब बुझेगी ?? ये लालच,चोरी व दौलत की भूखकब मरेगी
…उस दिन से जी भर जिया नहीं पानी में हूँ मगर एक बूंद भी पीया नहीं कि जब भी चाहा आईने में देखूं अपना अक्श
लम्बी, छोटी नाजुक उंगलियाँ समवेत गोलबन्द होती हैं हथेली पर जब -मुट्ठी बन जाती है उनकी नजाकत अचानक हो जाती है मुट्ठी की ताकत हथेली
काॅफीघरों-चायखानों बैठकों , भाषण-मंचों के वृत्त से उछाले,पटके जाते हुए सरकाये , चबाये जाते हुए रात-दिन नीमजान हो गये हैं शब्द पीत,पस्त, खिन्न! शिद्दत से