कविता

Category: कविता

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रंग इन्द्रधनुष

धरती का हरापन सदा से बुलाते रहे मुझेमैं उसके आँचल में दूब बनकर पसर गया ,नीला विस्तृत आकाश हुर्र बुलाता रहा मुझेमैं उसमें घुसकर नीलकंठ

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अतीत के गवाक्ष में नारी

सुनते हैंकथाओं में कभी स्वर्ण युग थेजब चेतनाओं परकोहरा न छाया था गुनाह काजमीन ज्यादा औरलोग कम थेखुला आकाश बेफिक्र होकर देख सकते थेकोई भी

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गाँव जा रहा हूँ

आज फिर अपने गांव जा रहा हूँ वही पीपल, सिमल और बरगद के छाँव जा रहा हूँ आज फिर अपने गाँव जा रहा हूँ फिर

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बस जाओ ज़रा

मेरी सांसों में तुम,बस जाओ ज़रा जिंदगी ये मेरी महक जाएगी। रात ख्वाबों में,आया करो रोज़ तुम शान से मेरी रातें गुजर जाएंगी। चंद पल

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मुस्काती है

पुष्प पत्र सम मुस्काती है, दिल को वो बहलाती है। प्रेम कवि हूं मैं, प्रेम मुझे सिखलाती है।। जहां भी जाए,अदा दिखाए अदा दिखा के

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अपनी भाषा में प्यार

जइसन फोन बजा राती मा, हम आंखी मिजआवै लागे। नाम तोहार देखतै मान, इयरफोन हम ढूढ़ै लागे।। बिस्तर तौ छोड़ा, बिस्तर के नीचे आय गये।

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