
संघर्ष
सिंह आदि मांसाहारी को, करना हैं पड़ता , संघर्ष अगर । तो प्राण रक्षा हेतु भागते, मृग आदि शाकाहारी डरकर।। मृग आदि शाकाहारी को ,

सिंह आदि मांसाहारी को, करना हैं पड़ता , संघर्ष अगर । तो प्राण रक्षा हेतु भागते, मृग आदि शाकाहारी डरकर।। मृग आदि शाकाहारी को ,

होती हैं बहुत कष्टदायी यह सर्द रातें, विशेषत: उनके लिए जो घरों में रहना चाहते । मज़बूरी और भाग्य की ठोकर ना जानें वो बेचारे

मिलती है असफलता एक बार में, तो उससे भी कुछ सीखा होगा उस बार में उस अनुभव को न जानें दो बेकार में क्या कमी

चक्रव्यूह के हर द्वार परमैं अकेला ही खड़ा था,महारथियों कीसमवेत सेना के सम्मुख,तलवारों की नोंक सेअपने को बचाता हुआअंधी सुरंगों के बीचउजास की रेखाएं ढूंढ

हम सब अपने अपने धर्म के तरफदार हैं मगर धर्म है कहाँ मंदिर में देखा तो मूर्तियां मिली घण्टी,घड़ियाल दीप धूप बत्ती मिली मगर धर्म

( उपन्यास सम्राट कलम के सिपाही प्रेमचंद जी द्वारा रचित पूस की रात कहानी के सारांश पर आधारित ) पूस की वो ठंडी रात ,

#Morning with night हर सुबह रात से आती है हर सुबह रात की सुबकी है हर दमक तम का प्रतिबिंबन हर ख़ुशी कष्ट की ललिता

दिसंबर जा रहा है मुझको,फिर से जार जार करके । तेरी यादों को मेरे दिल में,फिर से तार तार करके ।। बिछड़े हुए तो तुमसे,एक

शांत रुदन अन्सुअन भी साथी मेरे ——————————- अरे यह क्या!अचानक बंद हो गई कहाँ गए सब आँसू आँखों के ? सूख गए! आवाज़ें निःशब्द हो

धरती का हरापन सदा से बुलाते रहे मुझेमैं उसके आँचल में दूब बनकर पसर गया ,नीला विस्तृत आकाश हुर्र बुलाता रहा मुझेमैं उसमें घुसकर नीलकंठ