
ना कह कर पछताया है मन
भावों की इस बेला में, तर्क कहांँ चल पाएगा ना कह कर पछताया है मन कह कर भी पछताएगा शब्दों की इस भीड़ भाड़ में

भावों की इस बेला में, तर्क कहांँ चल पाएगा ना कह कर पछताया है मन कह कर भी पछताएगा शब्दों की इस भीड़ भाड़ में

कुहरा घना छाया हुआ है ,पर्व यह आया हुआ हैठंडी हवा के झोंकों से, मन ये सकुचाया हुआ हैलग गई है भीड तट पर, जनसैलाब

नव जीवन उत्सर्जन करती उद्बोधन प्रकृति मानो जगा रही मानव को चिरनिंद्रा से देखो कैसे नव उत्सर्जन फिर से भरता प्राण न हो सुसुप्त ए

यह प्रेम अगर फिर अपना होता मैंने भाग्य सँवारा होता तुम मिलते फिर फिर से मुझको क्यो प्यार मेरा बञ्जारा होता कुछ भी मेरे पास

मेरे बाद मेरे गीतों की का एक सुंदर संसार बसाना करुण वेदना की बेदी पर अमर प्रेम का दीप जलाना मेरा जीवन एक कथा

हाँ, मौन हूँ मैं…! कहता कुछ नहीं फिर भी सब समझाता हूँ। शब्दों से हौड़ नहीं फिर भी चीख़-चीख़ बतलाता हूँ। एक रिश्ता हूँ सुर्ख

पल दो पल का कारवां पल दो पल का ज्ञानमयकदे मे चोर पुलिस सब है इक समानआता वाता कुछ नही दे रहे गीता ज्ञानइन्सानो ने

आये ख्याब में मेरे,लिए मुँस्कान होठों पर अब न रहा अख्तियार मेरा, मेरे सासों पर मशहूर हो गया मै भी हुस्न की गलियों में मैैने

न रातें रहीं , न वो बातें रहीं,न मोहब्बत रही न मुलाकातें रहीं ll तुम कहते हो कि मैं बदला नहीं,मैं कहता हूँ कि न

पुँछकर देखा खुद से क्या खोया क्या पाया हमने चंद चाँदी के सिक्के पाये है पर मुस्कान खोया हमने बेचकर शकुन दिल की शहर से