कविता

Category: कविता

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वो बसंत की याद

उस दिन हमारे प्रेम में मानो …ओस की ताजा ताजा हल्की भीगीबरसात थी वह बसंत कीरोपा था हमने यहीँ बस यूँ हीवह सरसों का पीला

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बेटियाँ

अनुराग का बाग लगे हिरदयंजिसमें नित झूल रहीं हैं बेटी। नित नूतन कुसुमित पल्लवित होंदुःख दर्द को भूल रहीं हैं बेटी ।। बड़े भाग्य सानिध्य

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हरिजन

हरिजन वही है जिसेहरि ने जना हो मित्र ।बातें विचित्र करचित्त ना बिगारिए ।। धर्म की ध्वजा केवाहक सभी हैं यहाँ ।निज हृद स्थल सेसंसय

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मोबाइल

कराग्रे वसते लक्ष्मी कीभूलि गये अब बात ।आंख खोलते बिस्तर पर हीमोबाइल हो हाँथ ।। मोबाइल से आज हुए हैंअपने भी बेगाने ।इसी मोबाइल के

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हंस वाहिनी

हंस वाहिनी,मां सरस्वती,ज्ञान का भण्डार दे दो, शील वाणी में सदा हो,काव्य का संसार दे दो। प्रेम सबको दें सदा हम, प्रेम की आकांक्षा है,

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बसन्त/गणतंत्र

फिर बिरहिन मन में हूक उठीजब बाग़ में कोयल कूक उठीसरसों भी मन में फूल रहीवायु के संग में झूल रहीभौंरे भी गीत सुनाते हैंफूलों

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सरस्वती वंदना

पट खोले हैं माता मैं तेरे द्वार आई हूँ धन धान्य के नहीं मैं शब्द हार लाई हूँ अज्ञानी हूँ विमूढ़ हूँ माँ ज्ञान से

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तिरंगा

भारत माँ की लाज बचानेजाने कितने वीर चले ।कमर लगाकर पिस्तौलों कोहांथो ले शमशीर चले ।।जलियाँवाला बाग हो चाहेहो अल्फ्रेड का पारक ।सभी जगहपर जान

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गणतंत्र दिवस

आज हम भारतवासी , गणतंत्र दिवस मना रहे हैं ।।बांट रहे खुशियां मिठाईयों के संग सभी ,झंडा फहरा कर सब ,राष्ट्रगीत गा रहे हैं ।आज

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आजादी

एक दिन गणतंत्र दिवस की चढ़ी खुमारी है, छुट्टी का दिन है बस यही बात इसकी प्यारी है, कितनों के दिल में धड़कता है देश

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