कविता

Category: कविता

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हम हन दलित नारी

तुम सब जने अछूत कहत, हम हन दलित नारी।गरीबी विभेद अन्याय, भूंख प्यास से हम मारी।।तुमरे घर कोई जानवर मरे तो दलित मर्द उठाईस हय

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पृथ्वी- समुद्र प्रेम

हे धरणे! मैं तुमसे प्यार करता हूँ इतना। वह शब्दातीत है, वर्णनातीत है हमेशा से मेरी उठने वाली तरंगे लगती हैं जैसे प्रफुल्लित उमंगे उन्होंने

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 रिटायरमेंट

सेवा पुस्तिका में लिख दी गई एक ही दिन सेवा नियुक्ति के साथ लिखी  सेवा निवृति दोनों ही शब्दों में ’नि’ लगा है उपसर्ग लेकिन

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व्याकुल अखियाँ

व्याकुल अखियाँ तरस रही हैं दीदार तुम्हारा पाने को झर- झर होकर बरस रहीं हैं दरश तुम्हारा पाने को तैयारी मिलकर करो अब श्याम संग

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मेरे पाँव की पायल

मेरे पाँव की पायल भारी होती चली गयी। मैं मंदिर से महफिल होती होती चली गयी॥ जाने कितने ब्याह रचाए, फिर भी रही अकेली, जिसने

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आपका आँचल

कुछ इस कदर छाया है आँचल आपका मुझपर जिधर देखता हूँ आलम्ब आपका पाता हूँ। राहें जिन्दगानी में तुफानों से भरी जवानी में, जब कभी

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