
मैं बिखरता नहीं
मैं बिखरता नहीं अगर समेट लेतेखुद के सपनों में धक्का लगाने के काबिल तो रहता। कदे प्यार मुझसे अगर तुम कर लेते,मरते दम तक तुम्हारे

मैं बिखरता नहीं अगर समेट लेतेखुद के सपनों में धक्का लगाने के काबिल तो रहता। कदे प्यार मुझसे अगर तुम कर लेते,मरते दम तक तुम्हारे

बात कर लेने मात्र से ही तो मन मे दबी भावनाएं उखड़ने लगती हैं मन पर बढ़ा हुआ भाव हल्का हो जाता है मन में

निर्मोह बहती रही जीवन राग कहती रही आया जो पाया वही जग सुख-दुख का पुंज सही जाना है मंजिल सही मोह नहीं संदल सही ठहराव

सुवासित शीतल सुखद बयार, भ्रमर मकरंद चखे स्वछन्द। लोग कहते हैं तुम्हें बसंत, प्रणय प्रण के अद्भुत आनंद।। सरसो के पीत हेम से पुष्प, कोयल

कंचन के कंगन की किकिंणि की खनकार, कर्णप्रय होत मन अति हरषात है। खेलत अहेर मार मारत है पंच सर, कलियन पर अलि देखि मन

आपके स्नेह की शीतलता से मन मानो शांत था आपका आलिंगन छुवन तपिश खत्म करता था यादों की उष्णता से आज मन विचलित होता हैं

माँ अब मैं बडा हो गया हूं सौन्दर्य भरा जीवन व्यतीत कर रहा एक बच्चा भवन का मालिक समझता खुद को जब मां लाती है

देखो ‘ मैं नहीं मानता पत्थरों में बसे भगवान को सुना है तुम रोज जाती हो माथा टेकने मैं तो यही कहूंगा अगर वहां ईश्वर

अरे वाह! तुम तो बहुत समझदार हो गये चार किताबे क्या पढ ली छिपाने लगे अपने दर्द मुस्कुराना फैशन बना लिया पूछता हूं क्या हुआ

नहीं चाह मुझे तुम प्रेम की मिसाल बन जाओ न मर्यादा हो ऐसी कि सिया के राम बन जाओ न समझाने को प्रेम राधा के