
शब्द से चेतना तक नयन ही नयन
शब्द से चेतना तक फैले हुए हैं हर तरफ नयन ही नयन नयनो की अपनी लिपि अपनी भाषा अपनी विधा अपनी सूक्तियां अपने दोहे अपनी

शब्द से चेतना तक फैले हुए हैं हर तरफ नयन ही नयन नयनो की अपनी लिपि अपनी भाषा अपनी विधा अपनी सूक्तियां अपने दोहे अपनी

मैं कहता हूं कि तुम भुला दो मुझे,कान्टेक्ट लिस्ट से हटा दो मुझे,ड्राइव से फोटो मिटा दो मेरी,गैलरी से पिक्चर हटा दो मेरी,सोशल साइट पर

कब तक पाठ शान्ति का हमको,अभी पढ़ाया जायेगा।कब तक इन पत्थरबाजों से,हमको पिटवाया जायेगा।।कब तक हम अपने ही घर में,अत्याचार सहें बोलो।कब तक करते रहें

करें बाँहों में बल पैदा,सहारा है नहीं कोई, ज़माने में कहीं देखो,तुम्हारा है नहीं कोई| हुई हैवान दुनिया है,मरी इन्सानियत सबकी, खुद ही में डूबकर

जो बदन थी दोहरी, इकहरी हो गई, ग़मों की धूप से हट जा, दुपहरी हो गई| प्यार उसका अभीतक, भूला नहीं पाया, ऐसा लगता है

बाबू जी,मुझे फिर से वही बचपन चाहिए ।कि आप दफ़्तर से वापिस आओ,तो साथ में लाओ,मेरी ख्वाहिशों का इंद्रधनुष । अपनी ख़ाली जेबों के,वो खनकते

गंउआ के खुशी खातिर डिउहार का मनाइन जब जब परी बिपतिया तब तब दिया जराइन अम्मा कै अपने जेतना बखान करी कम है उनहीं तौ

मैं कहता हूं कि तुम भुला दो मुझे,कान्टेक्ट लिस्ट से हटा दो मुझे,ड्राइव से फोटो मिटा दो मेरी,गैलरी से पिक्चर हटा दो मेरी,सोशल साइट पर

परीक्षा भी स्व इच्छा से देने वाले।डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बिहार वाले।उन्हीं की ज़ुबान, में उनकी ही,बोलती बंद, कराते हैं,यूँ ही नहीँ हम, मैं तुम

सता लो तुम चाहे जितना मैं तुमको न सताऊंगा ।कभी तो बैठोगे चुपचाप जब तुमको याद आऊंगा ।। कदर करता तुम्हारी हूं तब भी तुम