कविता

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कविता का औघड़

वन के दुःख दर्द अमंगल, सबसे प्रीत निभाऊंँ रे। मैं कविता का औघड़ साधू, धूनी अलख जगाऊँ रे।। जिनकी खुशियों को सपनों के चन्द लुटेरे

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प्रेम

मौसम का फिजा यू बदलने लगा ना तुम होश में थे ना मैं होश में लगा देखा जिस ने उसी ने कहा ये कौन सा

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पुलवामा

टुकड़ों में बटां था, रखवाला गद्दार था ,कोई घरवाला जान ना सका इरादा उसका दुश्मन को धूल चटाने वाला बांट दिया था ,टुकड़ों में गद्दारों

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नारी

है नारी जग की क्यारी जीवन उसकी न्यारी न्यारी रखती सबका ख्याल है जीवन सवारी सवारी दायित्व परिवार का वंश और घरवार का रिश्ते में

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प्रतीक्षारत

प्रतीक्षारत थक जाती हैं आँखे पर नही थकती प्रतीक्षा अवचेतन में पड़ी यादें नही रहने देती चैन से मन भी रहता हैं विचलित टटोलती हैं

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बगियम् नवा बसंत(अवधी कविता)

दुलहिन अस धरती सजी भवा सीत कै अंत लयि पुरुवाई आयि गै बगियम् नवा बसंत बगियम् नवा बसंत लिखैं प्रिये प्रियेतम का पाती अउ महुआ

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आइस पाइस गुल्ली डंडा(अवधी कविता)

आइस पाइस गुल्ली डंडा गिट्टक अउर कब्बड्डी बाजी जीतै बदे लगी खुब बेरि बेरि हरबद्दी कहां दिन चला गवा ! बगिया बगियम् चलत रही दुपहरियम्

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बुरा ना मानव होली हय(अवधी कविता)

होली हय भाई होली हय बुरा ना मानव होली हय।फागुन महिनम उड़त हय धुरी मिठ सब कय बोली हय।।गोंहू अउर महुवा पाक चुनर सब कय

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हमका बस पियार चाही(अवधी कविता)

पैसा सोना चांदी टीवी फ्रिज ना हमका कार चाही।मिलय मेहरूवा सीधी साधी सुन्दर व्यवहार चाही।।मानय हमका लरिका जस अस हमका ससुरार चाही।सालिक मानी बहीनी जस

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