कविता

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आंतरिक शक्ति

बाहर से टूट भले जाओ पर अंदर से मजबूत रहोबल पौरूष कुछ घट जाए पर दिल इच्छा बलवान रहोटूट गये जो अंदर से तो बचा

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डाल में बैठी चार गौरैया

डाल में बैठी चार गौरैया मंथन करती विषय अनेक कहां जाएं राहें तकें अनेक कहीं और है उनको जाना सारा जग है जाना पहचाना मंथन

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अम्मा सिरका लिहिउ सजाय

गन्ना कै रस आवत होई डेउढी का महकावत होई लिहा गिलासी छोटका बबुआ गझिनै दहिउ मिलावत होई सुधि चैती बइसाख कै आवै दांत लड़कपन कै

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अवधी

अम्मा हमार

गंउआ के खुशी खातिर डिउहार का मनाइन जब जब परी बिपतिया तब तब दिया जराइन अम्मा कै अपने जेतना बखान करी कम है उनहीं तौ

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अंधविश्वास का मायाजाल

हमारे भारत में, गलत को गलत कहना भी,सबसे बड़ा पाप है, अपराध है। क्यों के कई बार प्रमाण से ज्यादा,अपने ज्ञान से ज्यादा,समझ, अपनी शिक्षा

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निर्झर शब्दलहर

आँसुओं से निर्झर अश्रु श्रँखला निर्बाध बह चली मानों दोनो के मध्य संधि अनुबंध करार बना चली अविरल अश्रु धारा मानों तटीबन्ध तोड़ बस चली

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आंखों का सागर

देखा मैंने सागर को जब तेरे इन दो नैनों मेंभाव मेरा तो भावुक होकर डूब गया तेरे नैनों मेंसागर की क्या गहराई होगी जितनी तेरे

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मेरे मन की बात

मेरे एहसास, मेरे शब्द,मेरी धड़कन, मेरे नब्ज।मेरा अपना, मेरा सपना,मेरी उम्मीदें, मेरी ख्वाहिशें।मेरा वजुद, मेरा सुकून,मेरी खुशी, मेरा जूनून।मेरा रब, मेरी प्रार्थना,मेरी दुआ, मेरा आसमां।मेरी

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