स्त्री लिखती है तो आकाश उतर आता है

स्त्री लिखती है तो आकाश उतर आता है

स्त्री लिखती है
तो लगता है पूरी प्रकृति
और संवेदना की आत्मा तक को
संवाद करने की राह मिल जाती है
स्त्री जब लिखती है तो
व्योम की गहनतम परतों को भी
शब्द बिंदुओं में मुखरित होने का
मिल जाता है अवसर
स्त्री ने लिखा जब
अपनी त्वचा पर फैली
लाल लहू की गांठों के बनने के वृतांत को
तो शब्द दर शब्द आंसुओं का सैलाब
अपने सबूत समन्दर की तरफ बढ़ने लगा
पत्थर भी अश्कों से भर गए इंसान तो क्या
स्त्री लिखती है
जब प्रेम के अंतरंग क्षणों को
तो धाराएं फूट पड़ती है
रग रग में रोमांच विचलित होने लगता है
जैसे अनुभूतियों के पात्र में शब्द तैर रहे हो
लम्हे लम्हे शब्दित हो,निनादित होने लगते है
स्त्री जब लिखती है
स्त्री का हृदय
तो खुलने लगता है
ब्रह्मा और ब्रह्माणी के गुप्त संवादों के रहस्य
स्त्री लिखती है तो
अभिव्यक्तियाँ नूतन हो उठती है
शब्द सजल निर्मल कोमल हो जाते है
जैसे कलम की स्याही नहीं
कागज पर मर्म ही स्पर्श ले कर चल रहा है
स्त्री अगर श्रीमद भागवत गीता लिखती तो
गीता की आभा ही बदल जाती
जन्म,मृत्यु और कर्म अकर्म का योग अभिनव वैराग्य
और संलिप्त मोक्ष गढ़ता
शायद जीवन
गाथा बन्द होकर भी
जीवन नैत्र खुला होता

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रचनाकार

Author

  • त्रिभुवनेश भारद्वाज "शिवांश"

    त्रिभुवनेश भारद्वाज रतलाम मप्र के मूल निवासी आध्यात्मिक और साहित्यिक विषयों में निरन्तर लेखन।स्तरीय काव्य में अभिरुचि।जिंदगी इधर है शीर्षक से अब तक 5000 कॉलम डिजिटल प्लेट फॉर्म के लिए लिखे।

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