ज़िन्दगी

बिक गये जो वस्तुओं की भाँति

होकर चरण-चाकर रह गये

जन के मन में,यश-गगन में

आज हैं,कल भी रहेंगे

आँधियों का वेग

अपने वक्ष पर जो सह गये !

रौशनी वश में सदा उसके रही है

जो तपा करता है प्रतिपल

है यहाँ प्रतिमान – यह दिनमान।

हो भले चिकना बहुत/ तारों सजा , पर

पराश्रित है चन्द्रमा

रौशनी की याचना में

सूर्य के सम्मुख/विनत है सर्वदा ।

चोट केवल चोट/सहते जा रहे

जान लो, हम चिनक जायेंगे नहीं

शीशा नहीं/हम गर्म लोहा हैं

जिसे चोटें सही आकार देती हैं

तुम्हारी दृष्टि में

जिस पर अहं की अन्धता ही चढ़ रही है

निरन्तर म्रियमाण हैं हम

फूल-फल तो तुम रहे हो !

दशानन-दृष्टि में भी- रीछ,नर, वानर

महज़ आहार थे

हुआ विपरीत ही संग्राम में !

तुम जी रहे जो ज़िन्दगी

वह मात्र बलि है/मृत्यु-वेदी के लिए

हम जी रहे जो ज़िन्दगी

उदरस्थ उसको मृत्यु भी/कर नहीं सकती।

हमारी ज़िन्दगी दावाग्नि है

महावन में मृत्यु के

जिसकी न खोती अस्मिता

हमारी ज़िन्दगी बड़वाग्नि है

मृत्यु-सागर के हृदय में/कौंधती है!

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रचनाकार

Author

  • डॉ रवीन्द्र उपाध्याय

    प्राचार्य (से.नि.),हिन्दी विभाग,बी.आर.ए.बिहार विश्वविद्यालय,मुजफ्फरपुर copyright@डॉ रवीन्द्र उपाध्याय इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है| इन रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है|

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