काफिला

बुलबुले-सा बनता-मिटता जाएगा शिकवा-गिला

टूटने पाये न अपने स्नेह का यह सिलसिला ।

व्यर्थ की बातों में बहकेंगे-बँटेंगे हम अगर

ध्वस्त होगा किस तरह फिर झूठ का दुर्गम क़िला ?

इस चमन में सरक आये हैं कहीं से साँप कुछ

चीख़ता है रात में कोई न कोई घोंसला ।

कब से ठहरा है यहाँ मनहूस मौसम इस क़दर

फसल के बदले लगे हैं लोग बोने फासला ।

एक डग संकल्प का मंज़िल को है ललकारता

अनिश्चय के घाट पर मत रोकिए अब काफिला ।

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रचनाकार

Author

  • डॉ रवीन्द्र उपाध्याय

    प्राचार्य (से.नि.),हिन्दी विभाग,बी.आर.ए.बिहार विश्वविद्यालय,मुजफ्फरपुर copyright@डॉ रवीन्द्र उपाध्याय इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है| इन रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है|

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