ऋतुराज का जादू

धूप में वापिस तपिश आने लगी

फिर हवाओं में घुली ख़ुशबू !

पतझरी मनहूसियत के दिन गये

हर नयन में उग रहे सपने नये

ठूँठ में भी पल्लवन की लालसा

अजब है ऋतुराज का जादू !

रंग , रस , सिंगार के दिन आ गये

मान के, मनुहार के दिन आ गये

आ गये दिन प्रतीक्षित अभिसार के

छलकता अनुराग है हर सू !

शूल सहमे-से खिले इतने सुमन

चतुर्दिक हँसता हुआ है हरापन

उठ रहा है स्वर पिकी का आगगन

लगीं सुधियाँ बदलने पहलू !

फिर हवाओं में घुली ख़ुशबू! !

Facebook
WhatsApp
Twitter
LinkedIn
Pinterest

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

रचनाकार

Author

  • डॉ रवीन्द्र उपाध्याय

    प्राचार्य (से.नि.),हिन्दी विभाग,बी.आर.ए.बिहार विश्वविद्यालय,मुजफ्फरपुर copyright@डॉ रवीन्द्र उपाध्याय इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है| इन रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है|

Total View
error: Content is protected !!