इस सफ़र की

जिंदगी के इस सफ़र की,कब सुबह और रात कब l
सोचता है लूट कर, कैसी रही वह रात कल l
आया नहीं, कोई भी मक़्सूद देखो इस तरफ (महबूब)
बिखरे रहे जज़्बात तन्हा, उनकी चौखट रात भर ll

टूट कर बिखरा मगर हिम्मत नहीं हारी कभी,
राह पर बढ़ धीरे धीरे, जीत ली बाजी सभी ll
घाव का खुद मलहम बन खुद को संभाला हर घड़ी,
बदकिस्मती से युद्ध में, हिम्मत लड़ी , हिम्मत लड़ी ll

सारे तजुर्बे वक्त की आग में पकते रहे,
ख़्वाब आँखों में कभी जलते रहे बुझते रहे l
आँधियाँ आयी गयी, छप्पर सलामत रह गए,
हौसले और धैर्य के कंधे बराबर रह गए ll

पा की दुआयें पैर बन चलती रहीं मंजिल तलक,
माँ की दुआयें उम्र भर , चूमती रहीं मेरी पलक l
अपनों ने ऊंगली थाम कर, मुश्किल में अपना हाथ रख
रखता गया अपने कदम,कभी इस फलक कभी उस फलक ll

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रचनाकार

Author

  • आलोक सिंह "गुमशुदा"

    शिक्षा- M.Tech. (गोल्ड मेडलिस्ट) नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कुरुक्षेत्र, हरियाणा l संप्रति-आकाशवाणी रायबरेली (उ.प्र.) में अभियांत्रिकी सहायक के पद पर कार्यरत l साहित्यिक गतिविधियाँ- कई कवितायें व कहानियाँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं कैसे मशाल , रेलनामा , काव्य दर्पण , साहित्यिक अर्पण ,फुलवारी ,नारी प्रकाशन , अर्णव प्रकाशन इत्यादि में प्रकाशित l कई ऑनलाइन प्लेटफार्म पर एकल और साझा काव्यपाठ l आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी लाइव काव्यपाठ l सम्मान- नराकास शिमला द्वारा विभिन्न प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत व सम्मानित l अर्णव प्रकाशन से "काव्य श्री अर्णव सम्मान" से सम्मानित l विशेष- "साहित्यिक हस्ताक्षर" चैनल के नाम से यूट्यूब चैनल , जिसमें स्वरचित कविताएँ, और विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं पर आधारित "कलम के सिपाही" जैसे कार्यक्रम और साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षा प्रस्तुत की जाती है l पत्राचार का पता- आलोक सिंह C- 20 दूरदर्शन कॉलोनी विराजखण्ड लखनऊ, उत्तर प्रदेश Copyright@आलोक सिंह "गुमशुदा"/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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