रंग के संग भंग और हाथ में गुलाल हो
झूम रही सबके मन में फागुनी बयार हो
खेलते गुलाल सब ही गाते एक राग हो
टोलियों के पीछे आज रंग का फुहार हो
होलिका जली हुई सुना रही थी ये व्यथा
जलते हैं सदा वही जो पापियों के साथ हो
पर्व तो है भाव दिल के जोश के उमंग का
भाव में ही डूबकरके भाव भरा रंग हो
खिल रही गुलाब कलियां जैसे उसके गाल पर
गाल सब के रंग दू आज चाहता गुलाल हो
भूलकर के गिला शिकवा प्रेम से मिले सभी
हर्ष प्रेम से भरा ही रंग और गुलाल हो
भीग जाए तन ये मन और प्रेम का गुबार हो
चारों तरफ ऐसी आज फागुनी फुहार हो
रचनाकार
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गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


