आसमा पर इंद्रधनुषी नाव अब चलने लगी
खो ना जाए आसमां में सोचकर डरने लगी
बैगनी थे यात्री उस पर श्वेत खेवनहार था
चल रही थी जिस जगह ओ नीलाकाश था
अंत था ना छोर था ना किनारा था कोई
नयन उस पर ही गड़ाए देखता था हर कोई
पूरा गगन फैला हुआ था नीले बिछौने की तरह
लाल नीले श्वेत बादल चित्रकारी की तरह
मन मेरा तो जाकर डूबा भाव में ही उस जगह
खुशी मिली दिल को मेरे देखकरके वो जगह
डूब ना जाए ये नइया अब तो इस मझधार में
सोच कर ही मन ये डूबा करुण रस के भाव में
दिल से दिल के मिलन का मौसम अब छाने लगा
रह रह कर दिल को मेरे भी याद ओ आने लगा
सोचता हूं आसमां पर एक ठिकाना हो मेरा
चाल धोखा जो जमी पर उससे किनारा हो मेरा
डूब जाऊं मैं मनोहर प्रकृति के इस दृश्य में
रंग बिरंगी वादियों और बादलों के झुंड में
प्यार पांऊ मै प्रकृति का प्रकृति का दीदार हो
जो हृदय से उठे मेरे कविता का श्रृंगार हो
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


