पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

उंगलियाँ

लम्बी, छोटी नाजुक उंगलियाँ समवेत गोलबन्द होती हैं हथेली पर जब -मुट्ठी बन जाती है उनकी नजाकत अचानक हो जाती है मुट्ठी की ताकत हथेली

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शब्द

काॅफीघरों-चायखानों बैठकों , भाषण-मंचों के वृत्त से उछाले,पटके जाते हुए सरकाये , चबाये जाते हुए रात-दिन नीमजान हो गये हैं शब्द पीत,पस्त, खिन्न! शिद्दत से

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कोहरा

पहन कर चोंगा/ सफेद रोंयेदार सूरज के खिलाफ / निकल पड़ा है अंधकार! कोहरे में गुम हो गयी हैं गलियाँ, राहें बन्द है बच्चों की

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नया साल आया है !

पिछले हैं जख्म हरे ,दहशत का साया है विज्ञापन पर सवार नया साल आया है ! थिरक रहे साहब जी,हल्कू हलकान बहुत नगरों में नाच-गान,

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वसन्त आ गया !

कलियों की कनखियाँ, फूलों के हास क्यारियों के दामन में भर गया सुवास बागों में लो फिर वसन्त आ गया ! मलयानिल अंग- अंग सहलाता

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ऋतुराज का जादू

धूप में वापिस तपिश आने लगी फिर हवाओं में घुली ख़ुशबू ! पतझरी मनहूसियत के दिन गये हर नयन में उग रहे सपने नये ठूँठ

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तुम्हारी याद

तुम्हारी याद जैसे घने जंगल में भटके हुए प्यासे बटोही के कानों में बज उठे किसी निर्झर की आहट का जलतरंग! तुम्हारी याद, जैसे तंग

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गज़ल

दर्द दुहरा ग़ज़ल में पलता है , आपका मन महज़ बहलता है! रेत आँखों में ख़्वाब गुलशन के , ज़िन्दगी की यही सफलता है। हमको

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कहाँ हो तुम?

आक्षितिज पाँक्त हैं देवदार फुनगियों पर आसमान उठाये! पास की घाटी में गा रहा निर्झर अप्रतिहत ऊपर और ऊपर वातायनों में घुस रहे हैं दल

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