
मुद्दतें गुज़र गईं ख़ुद से मिले हुए
फिर मुद्दतें गुज़र गईं ख़ुद से मिले हुए, मैं ख़ुद में खो गया था तुझे सोचते हुए। और आप हैं कि हाथ लगाने पे आ

फिर मुद्दतें गुज़र गईं ख़ुद से मिले हुए, मैं ख़ुद में खो गया था तुझे सोचते हुए। और आप हैं कि हाथ लगाने पे आ

मेरी ये बात लोगों को नहीं भाती कि मैं अक्सर, जो वाबस्ता हो तुझसे ऐसा क़िस्सा छेड़ देता हूँ। ये दुनिया वाले ऐसे ही मुझे

इन आँखों को रुलाने का मज़ा कुछ और होता है, ख़ुदा से ख़ौफ़ खाने का मज़ा कुछ और होता है। हमारी ये ग़लत फ़हमी रुलाती

इन मुन्सिफ़ों की जेब में कितनी मलाई है, हैं दफ़्न सारे राज़ अदालत की गोद में। अब फ़ैसला कहाँ से मेरे हक़ में आएगा, इन्साफ़

परिवर्तन हो सुखद सादगी परख गुणो की व्यापकतायश फैले उत्कर्ष लेखनी प्रतिभा संग हो नैतिकताप्राप्त करें संसार सदा ही जो कृति गुण परिचायक होसदा जुड़ा

अगर ज्ञान का दीप जलता रहेगाखतम ओ अंधेरे को करता रहेगाअगर ना जलाया तू दिल मे ये दीपकअंधेरा सदा तुझको छलता रहेगासदा ही दिलों मैं

कविता मात्र कागज पर कलम से लिखी गई कुछ पंक्तियाँ नही हैं। उसका हर शब्द केवल वर्णमाला का योग नहीं है, जो आपस में जोड़

नया साल फिर आ रहा है, मन को मेरे जला रहा है । दिसंबर फिर से जा रहा है, नया साल फिर आ रहा है

वो जिसके वास्ते जनमों जनम ठहरा रहा होगा उसी के आने जाने पे कड़ा पहरा रहा होगा बहारों की ये ख़्वाहिश उसके भी सीने में

मान लेंगे वो बुरा तो मुस्कराना छोड़ दें किस सबब उनकी जलन में गीत गाना छोड़ दें अपना तो हर धर्म ईमां हर चलन है