पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

आज से बस मेरी हो

वजह रही हो चाहे जो भी मुझसे मिलने कीस्वार्थ में या की प्रेम में ही बात करने कीआंख के रास्ते से दिल में समाए बैठी

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कविता

सुहाने से मौसम में

जिंदगी के सफर में यूं ही घूमता हूंहवाओं के संग में ही मैं झूमता हूंवादियां जो प्रकृति की प्रफुल्लित खिली हैंउसी में ही जीवन का

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कविता

राम रावण युद्ध

आज अंतिम चरण युद्ध का चल रहाराम पर भारी रावण जब पढ़ने लगामारकर राम की सेना को आज तोमद मे खोकरके रावण भी हंसने लगाशक्ति

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कविता

रावण कहता है

हे राम प्रिय हमारे लंका में अब पधारोकर के विनाश निशिचर हमको भी जग से तारोंहे राम प्रिय हमारेभटकता फिरू मै कब तक निशचर की

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कविता

रह जाते यदि राजा बनकर जीवन लक्ष्य ना पूरा होता

आज अवध के राजभवन का उत्सव भी गमगीन हुआजिसको मिलना राज सिंहासन उसको तो बनवास मिलायुद्ध कला पारंगत कैकेयी राजा का जब प्राण बचायाखुश हुए

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गज़ल

आशिक़ी

आशिक़ी जब दरमियां बढ़ने लगी बिन तेरे तन्हाईयां बढ़ने लगी आस है तेरे मिलन की इसलिए दिन-ब-दिन बेताबियां बढ़ने लगी ज़िक्र तेरा महफिलों में जब

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कविता

कल,आज और फिर कल

कल मैं छोटा सा नन्हां सा अनभिज्ञ शिशु था , कहां थी पहचान ,अपनों और परायों की , जिनसे थोड़ा सा लाड़ प्यार पा लिया

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कविता

मन पतंग

मन पतंग कर्म एक डोरी है, हरदम थाम के रखता हूं। फिर भी देखो उड़ता हीं जाता, थाम ना इसको पाता हूं ।। मन बावरा

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