पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

गज़ल

दिल ने तुम्हें पुकारा

दिल ने तुम्हें पुकारा है सरकारे-दो जहां आओ मिरी मदद को ए मुख़्तारे-दो जहां मँझधार में किनारा दिया आपने सदा आये हो बनके आप ही

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कविता

जबसे हुए हैं शिक्षित

जबसे हुए हैं शिक्षित, ताजा विचार आयापरिपाटिया भी हमको, दिखने लगी छलावामाया का जाल ऐसा, कोई नहीं किसी काहर आदमी अकेला, हर चेहरा अजनबी साबाहर

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गज़ल

अब तैयारी है

हिज्रे तन्हाई शब गुजारी है। आ भी जाओ के अब तैयारी है। शुक्रिया कहूं तो मैं कैसै कहूं, अभी उनकी बहुत उधारी है। दिल तो

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कविता

एक दिन

करले तू इस जगत में सद्व्यवहार एक दिन। जाना पड़ेगा छोड़कर संसार एक दिन।। विषयादि त्रिगुण फंद अविद्या विकार में, स्व ढका मन बुद्धि चित्त

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गीत

और जीवन

ऐषणाओं के सघन घन और जीवन। आनुषांगिक भी न हो पाया अकिंचन और जीवन। शांत पानी इतने कंकड़। अंधड़ों की पकड़ में जड़, आत्मा ह्रासित

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कविता

बूढ़ा बैल

पौरुषता हरियाली का नाम ही किसानी थी l आज मैं बूढ़ा बैल हूँ कभी जवानी थी ll निर्धनता घर में थी श्रम से उसे उबार

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