पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

गज़ल

दंश

अशेष अनुराग से गुड़िये को सजाती तुम बिसर जाती हो खाना-पीना बुदबुदाती है माँ झिड़कियाँ सुनाती है बेपरवाह, तन्मय तुम क्या कुछ गाती-गुनगुनाती हो रचाती

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कविता

मंजिले दूर होती रही

मंजिले दूर होती रही राश्तों का कसूर होगा यह कोई नहीं सोचता रास्तों को चुनना भी तो हमारा दस्तूर होगा मंजिले नजदीक होंगी रास्तों को

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कविता

माँ होती है

माँ होती है तब जा कर एक वंश खानदान बनता है बेटे बेटियों पर सब कुछ वार दिया करती है तब जा कर वंश का

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कविता

व्याकुल मन

व्याकुल मन से कह रहा हूंँतुमसे इजहार है रानीतुमसे प्यार है रानीतुमसे प्यार है रानी तेरी आंखे समंदर सा हैमैं उसमे बहता पानीकण–कण में तेरा

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कविता

बलिदान वीर सपूतों का…..

बलिदान वीर सपूतों का…..इतिहास में अमर हैवो आज भी अमर हैवो आज भी जिंदा है वो आत्म स्वाभिमानजिसने झुकना कभी न जानामरते दम तक अंत

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कविता

हे राम!तुम्हारे चरणों में

हे राम !तुम्हारे चरणों मेंमेरा जीवन कट जाएमुझ पर कृपा करो प्रभो !मुझको न फुल समाए। तुझमें ही बसे मेरे आत्मातुझ पर ही जान गवाएमुझ

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कविता

मजदूर

करते हैं दिन रात परिश्रम तब जाकर जी पाते हैंकिसी तरह से जीवन में वो अपना पेट पालते हैंसुनना पड़ता है मालिक की डांट हमेशा

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कविता

मेरा हृदय उद्गार

हर एक मुस्कुराहट पहचान लेंगे हमगम है छुपा या खुशी इसको जान लेंगे हमकितना भी छुपाओ इसे अब दिल में रखकर तुमक्या चल रहा है

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कविता

तो कैसे सुधरेगे हालात

मजहब के रंग में रंगा हुआ जो पूरा देश है आजतो कैसे सुधरेगे हालातलूट के अपने देश की दौलत खुद बनते धनवानतो कैसे सुधरेंगे हालातसब्र

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