पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

ब्रज की रज

रज-रज में बसे चरण तुम्हारे ब्रज में, भूल जाऊं खुद को मैं लोट जाऊं रज में, स्वर्ग से सुंदर हर वन-उपवन ब्रज का है, जब

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चौपाई

हर हर महादेव

हर हर महादेव शिवशंकर। विनती स्वीकारो अभ्यंकर।। आशुतोष अव्यय अविनाशी। दर्शन दो हवि, हे कैलाशी।। महाकाल शितिकंठ कपाली। बिल्वपत्र से शोभित थाली।। गंगाजल से स्नान

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गज़ल

एक ख़त पुराना

एक ख़त पुराना मिल गया रंगीन ज़माना मिल गया एक शायरी आशिकी वो दीवानी-दीवाना मिल गया….. एक राह थी अनजान थे कोई मोड़ था कोई

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गज़ल

आरजू

साथ कोई हो ये आरजू रही है हर एक की मिल गए और न बने कमी रही विवेक की इंतजार ने बढ़ाई है चाहतों की

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