पद्य-रचनाएँ

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कविता

एकाकार

मन शांत लिए ही स्थिर सी आज बैठ गई थी मानों एकाग्रता में सोच पाऊँगी अपने को व अपने भविष्य को झांक पाऊँगी स्वयं में,

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कविता

गुरुदेव को विनम्र श्रद्धांजलि

भरे सम्मान गरिमा से,हिर्दय गंगा सा पावन थानिराले जगत से, दिल में, परम प्रिय प्रेम पलता थासदा ओठो पे धर मुस्कान, हृदय को जीत लेते

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कविता

कोई अपना हो ना सका

हमने तो उसे निहारा रात दिनजिंदगी में कभी जो मिल ना सकामिल गया था जिंदगी में जो मुझेपाके उसको कभी खुश हो ना सकाजिंदगी भर

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कविता

कुछ कहना है

कुछ कहना है बहुत अरसे से बेताब हैं दिल कोई लफ्ज़ नहीं जो हिम्मतवर बनकर अपनी बात कह दे कोई संकेत नहीं जो नित्य मन

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कविता

तमसो मा ज्योतिर्गमयः

तमसो मा ज्योतिर्गमय तम से प्रकाश की और ले जाने की अभ्यर्थना । प्रकाश नैराश्य के विरुद्ध प्रबल उत्साह का संघोष है । मन का

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कविता

जग की प्यास

प्यास जग की है बहुत कितना पियो बुझती नहींजो लगी है दिल में सबके आग वह बुझती नहींप्यास है जग को सुरा की मेघ से

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