प्यास जग की है बहुत कितना पियो बुझती नहीं
जो लगी है दिल में सबके आग वह बुझती नहीं
प्यास है जग को सुरा की मेघ से मिटती नहीं
जो भंवर से पार कर दे नाव वह दिखती नहीं
है कमी कुछ भी नहीं पर मन ये चिंतित हो गया
क्या कमी है दिल में मेरे मुझको ही दिखती नहीं
है भरा पूरा जगत पर मन यह खाली क्यों रहा
मन की इच्छा है ही ऐसी जो कभी भरर्ती नहीं
प्यास को ही भूल जाऊं वो भुलावा दे मुझे
त्याग कर सब कुछ कहूं मैं प्यास अब दिखती नहीं
भाव में ही डूब जाएं आंसुओं के बूद से
मर चुकी संवेदना की मे प्यास अब दिखती नहीं
बिन पिए कुछ प्यासे रह गए पीके कुछ प्यासे रहे
पीके जग से चल दिए कुछ जगत में प्यासे रहे
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


