कविता

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बूढ़ा बैल

पौरुषता हरियाली का नाम ही किसानी थी l आज मैं बूढ़ा बैल हूँ कभी जवानी थी ll निर्धनता घर में थी श्रम से उसे उबार

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पाती

नैन नीर में मसि मिलाकर हमने लिख दी प्रिय को पाती। भावो को लिपिबद्ध सजाकर बैरंग भेजी प्रिय को पाती।। मन पक्षी विहरत अनन्त तक

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मृगतृष्णा

एषणाओं की धरा पर‌ पनपती मन मृग में तृष्णा। जीव को चौरासी घट पट तक घुमाती है मृगतृष्णा।। आशाओं की प्रबल सरिता प्रवाहित अविरल मनस

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प्रेम पिपासा

अपरिछिन्न अलौकिक अविरल निश्छल सुसंस्कार कहां है। सदा से विलसित रहने वाली प्रेम सुधा रसधार कहां हैं। नव मालिका कली से भंवरा कहता है, सदा

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प्रेम दीप

निर्जनों में भी सहज मधुमय सदा सुखवास करती। प्रेम दीप की अमर ज्योति अंतसों में प्रकाश करती।। झंझावातों के भंवर से पार करती, मुक्तिपथ सुलभा

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बंटवारा

बूढ़े बरगद के चबूतरे पर घनेरी छांव में। देखो फिर एक आज बंटवारा हुआ है गांव में।। कुछ नये सरपंच तो कुछ पुराने आये, कुछ

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नव वर्ष मंगलमय हो

नव वर्ष मंगलमय हो नव वर्ष में अति हर्ष हो आनन्दवृष्टिअपार हो। मेरे हृदय में आपका अनवरत साक्षात्कार हो।। नव वर्ष ० उपवन सुगंधित हो

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कुछ पंक्तियां

कुछ पंक्तियां लिखने से भर आता है मन , कुछ पंक्तियां लिखने से  मिलता है बहुत अमन ।। कुछ पंक्तियां लिखने से  ऐसा होता है

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