कविता

Category: कविता

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अब बहारें भी

अब बहारें भी मेरे घर में,आती नही है, अब हवाएं भी तेरा,संदेशा लाती नही है ।। किस ओर चले गए,तुम छोड़कर मुझको, ये सदायें भी

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धन्य धन्य गुरु गोविंद सिंह, है धन्य तुम्हारे लाल । धन्य तुम्हारे त्याग है, है धन्य धन्य बलिदान ।। ऋणी रहेगा युगों युगों तक, ये

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धर्मराज का अंतर्मन

विनाश हुआ कौरव वंश का, पांडवों ने विजय थी पाई युधिष्ठिर का राजतिलक करके, द्वारिका को लौट गए कन्हाई, जाने क्यूं धर्मराज का, ह्रदय बहुत

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जबसे हुए हैं शिक्षित

जबसे हुए हैं शिक्षित, ताजा विचार आयापरिपाटिया भी हमको, दिखने लगी छलावामाया का जाल ऐसा, कोई नहीं किसी काहर आदमी अकेला, हर चेहरा अजनबी साबाहर

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एक दिन

करले तू इस जगत में सद्व्यवहार एक दिन। जाना पड़ेगा छोड़कर संसार एक दिन।। विषयादि त्रिगुण फंद अविद्या विकार में, स्व ढका मन बुद्धि चित्त

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बूढ़ा बैल

पौरुषता हरियाली का नाम ही किसानी थी l आज मैं बूढ़ा बैल हूँ कभी जवानी थी ll निर्धनता घर में थी श्रम से उसे उबार

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