कविता

Category: कविता

कविता

सियासत

आईना सच कह गया जब राज दरबारो मे टुकडो टुकडो मे बट गया आज बाजारो मे राम के अस्तित्व को ही नकारने लगे है लोग

विस्तार से पढ़ें »
कविता

इक सुर काश तुम्हारा होता

यह प्रेम अगर फिर अपना होता मैंने भाग्य सँवारा होता तुम मिलते फिर फिर से मुझको क्यो प्यार मेरा बञ्जारा होता कुछ भी मेरे पास

विस्तार से पढ़ें »
कविता

मेरे चेहरे पर कई जिम्मेदारियों की हैं झुर्रियां

मेरे चेहरे पर कई जिम्मेदारियों की हैं झुर्रियां ,तुम कहते हो, कि मैं अब उम्र दराज हो गया llतुम देखो कभी सवेरे मेरे डूबते सूरज

विस्तार से पढ़ें »
कविता

हो अगर मेरी तरफ

आँखों का होता इशारा गर कभी मेरी तरफचांद तारों का बदलता रूख सदा मेरी तरफलड़खड़ा गिरता कभी ना जिंदगी के मोड़ परतेरी बाहों का सहारा

विस्तार से पढ़ें »
कविता

निरूत्तर सी मैं

वाह रे मेरे समाज चरित्र का परिचय हर बार “स्त्री” ही क्यों देती है? जबकि चरित्र को खराब करने का काम “पुरुष” ही करता है..!

विस्तार से पढ़ें »
कविता

अनुभूति

आज भी वही मुलाकाते,बातें,वादे,इरादे वही आंतरिक अनुभूति की सिहरन सी मुझे स्वयं के भीतर कराती अहसास कि काश न किया होता स्वयं से समझौता आज

विस्तार से पढ़ें »
कविता

नववर्ष

नव वर्ष का नवल प्रभात अति सुखद सुवास हो। निर्झरिणी बहे स्नेह की जन जन में प्रेम प्यास हो।। प्रिय से मिलन की चाह हो,

विस्तार से पढ़ें »
Total View
error: Content is protected !!