कविता

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एक पल

मैंने कभी नहीं चाहाकि तुम संपूर्ण जीवन समर्पित करोसिर्फ चंद खुशियों के लिएमैंसिर्फ तुम्हारा एक पल चाहता हूं।उसी पल में जीना चाहता हूंसंपूर्ण जीवनअधरों पर

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चाहते तो तुम भी हो

चाहते तो तुम भी होकि आपके बायें बैठने वालीआपकी ताकत बनेकमजोरी नहीफिर क्यों करते हो दिखावासबके सामनेमुझे जलील करने कामुझे शर्मिंदा करने कासाथ न देने

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मां अब मै बडा हो गया हूं

सौन्दर्य भरा जीवनव्यतीत कर रहा एक बच्चाभवन का मालिक समझता खुद कोजब मां लाती है दूध का ग्लासतो फेक देता है बिना सोचे समझेमां के

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सुन मनोरमे, अपने नववर्ष का आना अभी बाँकी है

न काहू से ऐ यारी, न काहू से प्यार,सबके मन मे राम है, राम मैं बहे माघक बयार,आप किजूँ, अपना-अपना व्यापार,बस मुद्रा राम नाम के

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अजन्मी बेटियां

अजन्मी बेटियों के खून से रंगा ये समाज,मुझे हत्यारा दिखाई देता है ये समाज।शहरों से लेकर गांव तक, नगरों से लेकर कस्बों तक ,मुझे हत्यारा

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हम हैं

हम गौतमबुद्ध, की शांति हैं,भगवान महावीर की, अहिँसा हैं।बजरी के भी, लाल हमहीं,कार्लमार्क्स वाले, सर्वअहारा हैं। हाँ, हम अपनी, मजूरी ख़ुद ही,कमाने वाले है,हम लाल

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भवा देश कय बंटाधार

राजा गए प्रजा जब आए भवा देश कय बंटाधार। बढ़ी गरीबी हल्ला बोल चारिव लंग बस भ्रष्टचार।। लोकतन्त्र मा लुटेक पाईन नेतक खुलीगा देखो पोल।

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प्रकृति से पियार करो

प्रकृति से जीवन हय हम सबके प्रकृति से पियार करव। प्रकृति कईहां नकसान ना पहुँचाव उके कहर से डरव ।। प्रकृति भगवान कय रुप प्रकृति

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