तेरे भावों में ही डूबा रहा, मैं तो सदा लेकिन
मेरे भावों की भाषा को ,कभी तुम ना समझ पाए
मेरे भावुक हृदय से जो ,निकलते हैं कभी आंसू
ह्रिदय पावन के उस जल में ,कभी तुम डूब ना पाए
कभी देखा था जो सपना ,तुझे अपना बनाने का
वो सपने ही थे जीवन में, हकीकत मे न बन पाए
अंधेरे में ही रखा था, सदा जीवन को तुम मेरे
किरण एक भी उजाले की, कभी दिल में न ला पाए
मेरे जीवन को तूने ,भर दिया है ,दर्द से लेकिन
उमड़ते दर्द को आखिर, कभी तुम ना समझ पाए
सदा ही अपने जीवन का ,तुझे अमृत मै कहता था
विषैला ही किया जीवन ,कभी अमृत न बन पाए
सदा ही खुशबू फैलाई ,जगत में स्वार्थ की तूने
महकती फूल की खुशबू ,कभी भी तुम ना बन पाए
सदा ही राग छेड़ा था ,मधुर संगीत का मैने
मगर दिल में सजो करके, कभी ना गुनगुना पाए
सदा ही हार बैठा था ,तूझी पर अपना ये तन मन
मगर दिल जीत ले ,ऐसी लड़ाई लड़ नहीं पाए
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


