
अलाव
( उपन्यास सम्राट कलम के सिपाही प्रेमचंद जी द्वारा रचित पूस की रात कहानी के सारांश पर आधारित ) पूस की वो ठंडी रात ,

( उपन्यास सम्राट कलम के सिपाही प्रेमचंद जी द्वारा रचित पूस की रात कहानी के सारांश पर आधारित ) पूस की वो ठंडी रात ,

#Morning with night हर सुबह रात से आती है हर सुबह रात की सुबकी है हर दमक तम का प्रतिबिंबन हर ख़ुशी कष्ट की ललिता

हे गुरु गोविंद सिंह के लाल, तुमने कर दिया खूब कमाल । प्राण दे दिए अपने हंसकर, पर नही झुकाया कभी भाल ।। वजीर खान

दिसंबर जा रहा है मुझको,फिर से जार जार करके । तेरी यादों को मेरे दिल में,फिर से तार तार करके ।। बिछड़े हुए तो तुमसे,एक

शांत रुदन अन्सुअन भी साथी मेरे ——————————- अरे यह क्या!अचानक बंद हो गई कहाँ गए सब आँसू आँखों के ? सूख गए! आवाज़ें निःशब्द हो

धरती का हरापन सदा से बुलाते रहे मुझेमैं उसके आँचल में दूब बनकर पसर गया ,नीला विस्तृत आकाश हुर्र बुलाता रहा मुझेमैं उसमें घुसकर नीलकंठ

1सींग के दानेपेट की आग सिंकेभीगते बेचे। 2सूर्य सुखाताउपले-भित्ती टँगेगाँव की यात्रा। 3जहाजी पक्षीवस्त्र बदल थकायात्रा एकाकी। 4सूखे तालाबटूटी पसली गिनेरश्मि ‘एक्स रे’। 5जामुन फलेपेड़

1शोख अदाएँतितली ठुमकतीगोदभराईकलियाँ शर्माती हैंमाली की बाँछें खिली । 2भारी हैं- पाँवफूलों-तितलियों केखबरें उड़ीसौंदर्य बिखरा हैलोग बलैयां लेते । 3निगल जातीभूख की लंबी जीभसारी हेकड़ीक्या-क्या

1पेड़ काँपतेचश्मा बदले मालीबढ़ई हुआ मनदिखा सर्वत्रआरी,कुल्हाड़ी संगबाजार के सपने। 2भीगी हैं लटेंउड़ रहा दुपट्टावर्षा में भुट्टा खानास्मृति ताजीसौंदर्य दमका हैमिट्टी की सुगंध सी। 3पिंयरी

मेरे प्रियतम को ना जगाओ, सुमन सेज पर हीं रहने दो । अब तक तो ये जाग रहे थे, अब जी भर कर सो लेने