पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

आगोश

छिपा छिपा सा राज प्रकृति का जो देता संदेश सूर्यास्त बता रहा है मुझे कि वो चला शाम ढलते ही अंधेरे के आगोश में मिलता

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कविता

एकाकार

मन शांत लिए ही स्थिर सी आज बैठ गई थी मानों एकाग्रता में सोच पाऊँगी अपने को व अपने भविष्य को झांक पाऊँगी स्वयं में,

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गज़ल

ऑखिरी सलाम

कुछ खट्टी सी कुछ मीठी सी कुछ प्यार भरीं कुछ खार भरीं कुछ सौंधी सौंधी महक लिये कुछ यादगार कुछ भाव विमल कुछ रिश्तों की

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कविता

बिहारी हैं

माँ मैथिली गुरु, ख़गेश्वर नाथ,वाली जुबानी है,कोरे, काग़ज़, पे लिख लो,शाँति यही बस आनी है,विश्वविद्यालय बिहार, नालंदा,खुली कहानी है। धीश देखें, जग धीश देखें,पीने न

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