
प्रकृति से पियार करो
प्रकृति से जीवन हय हम सबके प्रकृति से पियार करव। प्रकृति कईहां नकसान ना पहुँचाव उके कहर से डरव ।। प्रकृति भगवान कय रुप प्रकृति

प्रकृति से जीवन हय हम सबके प्रकृति से पियार करव। प्रकृति कईहां नकसान ना पहुँचाव उके कहर से डरव ।। प्रकृति भगवान कय रुप प्रकृति

जागय से सोवय तक लईके खान पान पर धई लेव ध्यान।रोग बिमारी नियरे ना आई होई जाई सगरिव कल्यान।।दस तक खटियप सोव रात मा उठय

तुम सब जने अछूत कहत, हम हन दलित नारी।गरीबी विभेद अन्याय, भूंख प्यास से हम मारी।।तुमरे घर कोई जानवर मरे तो दलित मर्द उठाईस हय

मैं रखता हूँ इच्छाओं का अनंताकाश, नहीं माँगता मैं अवकाश। मन करता है कभी इस डाल पर इस डाल से कभी उस डाल पर डालूँ

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरुर्साक्षात परमब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥ दोहा- हाथ जोड विनती करूँ, दो विद्या का दान। इससे ज्यादा क्या कहूँ, मेरे गुरुवर

हे धरणे! मैं तुमसे प्यार करता हूँ इतना। वह शब्दातीत है, वर्णनातीत है हमेशा से मेरी उठने वाली तरंगे लगती हैं जैसे प्रफुल्लित उमंगे उन्होंने

सेवा पुस्तिका में लिख दी गई एक ही दिन सेवा नियुक्ति के साथ लिखी सेवा निवृति दोनों ही शब्दों में ’नि’ लगा है उपसर्ग लेकिन

व्याकुल अखियाँ तरस रही हैं दीदार तुम्हारा पाने को झर- झर होकर बरस रहीं हैं दरश तुम्हारा पाने को तैयारी मिलकर करो अब श्याम संग

मेरे उनके प्रेम को, जाने नहीं हर कोय। समझेगा इस योग को, प्रेमी जिसका होय॥ मेरा उनका प्रेम क्या, अब चढता परवान। मैं सुख से

फूल की बगिया में देखों आज ये क्या हो गया है। लूटकर मेरे चमन को काल जैसे सो गया है। भाइयों के वियोग में हूँ