पद्य-रचनाएँ

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पद्य-रचनाएँ

हे दीनबंधु(घनाक्षरी)

हे दीनबंधु कृपा सिंधु वीर बलदाऊ कै,विनती हमारी प्रभु आप सुन लीजिए।जगत के पाप हरो सबके संताप हरो,आइए प्रभु जी फिर अवतार लीजिए।गीता वाला ज्ञान

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कविता

कब तक पाठ शान्ति का हमको

कब तक पाठ शान्ति का हमको,अभी पढ़ाया जायेगा।कब तक इन पत्थरबाजों से,हमको पिटवाया जायेगा।।कब तक हम अपने ही घर में,अत्याचार सहें बोलो।कब तक करते रहें

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कविता

करें बाँहों में बल

करें बाँहों में बल पैदा,सहारा है नहीं कोई, ज़माने में कहीं देखो,तुम्हारा है नहीं कोई| हुई हैवान दुनिया है,मरी इन्सानियत सबकी, खुद ही में डूबकर

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कविता

जो बदन थी

जो बदन थी दोहरी, इकहरी हो गई, ग़मों की धूप से हट जा, दुपहरी हो गई| प्यार उसका अभीतक, भूला नहीं पाया, ऐसा लगता है

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गीत

साधक तिरस्कार-तम में हैं(गीत)

साधक तिरस्कार-तम में हैंतिकड़मबाजों का अभिनन्दन! सीना ताने झूठ चल रहा/सच दुबका-सहमा कोने मेंजिसे देखिए वही लगा है/यहाँ स्वार्थ-बीज बोने मेंअर्थ कूच कर रहे शब्द

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कविता

बाबू जी! मुझे फिर से वही बचपन चाहिए

बाबू जी,मुझे फिर से वही बचपन चाहिए ।कि आप दफ़्तर से वापिस आओ,तो साथ में लाओ,मेरी ख्वाहिशों का इंद्रधनुष । अपनी ख़ाली जेबों के,वो खनकते

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पद्य-रचनाएँ

तन-मन-धन(घनाक्षरी)

तन-मन-धन सब,वार जिस दिन आप,काम कोई करने को,आगे बढ़ जाते हैं।पग-पग पर जब,आ जाए चुनौती कोई,फिर भी न पग आप,पीछे को हटाते हैं।आती परेशानियां हों,

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कविता

भुला दो मुझे

मैं कहता हूं कि तुम भुला दो मुझे,कान्टेक्ट लिस्ट से हटा दो मुझे,ड्राइव से फोटो मिटा दो मेरी,गैलरी से पिक्चर हटा दो मेरी,सोशल साइट पर

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