
परछाईं
वे जब भी रोशनी में आते हैं,उन्हें मुँह चिढ़ाती है उनकी परछाईं |कभी छोटी, कभी बड़ी,कभी प्रश्नवाचक,कभी विस्मयादि मुद्राओं में आकार लेतीउन्हीं के अस्तित्व का

वे जब भी रोशनी में आते हैं,उन्हें मुँह चिढ़ाती है उनकी परछाईं |कभी छोटी, कभी बड़ी,कभी प्रश्नवाचक,कभी विस्मयादि मुद्राओं में आकार लेतीउन्हीं के अस्तित्व का

चाहो तो जड़ देना ताले दुनियां भर की किताबों पर लेकिन नहीं बना सकते तुम ऐसी कोई दीवार जो पहरे बैठा दे मुझ पर मैं

सृष्टि का उपहार है नारीनारी बिना सबकुछ सुना हैनारी तत्व ही दिव्य ज्योति हैउसके बिनासबकुछ अनसुना है। नारी तत्व से प्रेम निखरता हैनारी तत्व है

1.कुछ न कुछ बदलेगा जरूरक्यों कि बदल गया है मौसमदीवारों पर टंग गए हैं –हरे-भरे दृश्यों वाले नये कैलेण्डरकुछ और रंगीन हो गए हैंडालियों पर

मिलता है, जब कोई भंवर किसी कलि से प्यार मेंकली हिचकिचाती है, मगरथी तो वो भी, कबसे, इस घड़ी के इंतजार में, फिर खोलती है,

अन्तर्द्वंदों के शिखर पर खड़ा सा मौन हूँ मैं। न जाने कौन हूँ मैं…… गहन तिमिरान्ध में प्रकाश हूँ मैं, छलकते आंसुओं की आस हूँ

फिर मिले की न मिले ये खुला आकाश सारा साँझ की पिघली शिला का रेशमी सा ये किनारा हो न शायद अब कभी इस राह

क्या करूँ कैसे बताऊँ जन्म-जन्म की कथाएँ जो समय की कर्मनाशा में अकारण मिल गई जन्म लेता लुप्त होता धार में जल बिंदु सा फिर

एक सुनहरी शाम का अँंचल आंखों में लहराता है यादों में भी तन्हाई में कोई मुझे बुलाता है एक तसव्वुर एक तिश्नगी एक दुआ है

कमबख्त दिल से हो गये लाचार एक दिन। मैंने भी किया इश्क का इज़हार एक दिन।। एक खूबसूरत कली मेरे दिल को भा गई थी