देखो उस
अविश्रांत पथिक को
उज्ज्वल नभ के स्वर्ण-पुरुष को
खुद जल,जग ज्योतिर्मय
चलता पथ पर धीरे-धीरे
नहीं किसी का है गुलाम
निष्काम जगत की सेवा करता
जब थक कर पूरब सो जाता
तब भी जग,पश्चिम को जाता
खुद जल, कर, औरों की सेवा
‘दिनकर’ हमको नित्य सिखाता ||
देखो उस
अविश्रांत पथिक को
उज्ज्वल नभ के स्वर्ण-पुरुष को
खुद जल,जग ज्योतिर्मय
चलता पथ पर धीरे-धीरे
नहीं किसी का है गुलाम
निष्काम जगत की सेवा करता
जब थक कर पूरब सो जाता
तब भी जग,पश्चिम को जाता
खुद जल, कर, औरों की सेवा
‘दिनकर’ हमको नित्य सिखाता ||

कल्याणी प्रतिभा हो मेरी, मधुर वर्ण-विन्यास न केवल||Copyright@डॉ दिवाकर चौधरी इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |